संदेश

संयम

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वासना भावनाओं की एक सरिता है । इसका अर्थ अधिकतर यौन सम्बन्धों से ही ले लिया जाता है जबकि इसका साधारण अर्थ इच्छा, कामना, मनोरथ, ज्ञान,संस्कार आदि है । वासना एक आंतरिक मनोवेग है और यह स्वाभाविक है । जब इन मनोवेगों पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं हो पाता तब ही यह व्यभिचार का रूप लेती है । शुभकामना की तरह वासना भी की कामना भी शुभ ही है । कोई प्राणी इससे अछूता नहीं । मनुष्य को तो दृढ़तापूर्वक इस प्रकार के आत्मिक संघर्षो का सामना करना पड़ता है । इसे पवित्र बनाये रखने के लिए ईश्वर ने इसे पवित्र संस्कार का रूप दिया है जिससे मनुष्य विवाह संस्कार के पवित्र बंधन में बंधकर स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इस कामवासना को पूर्ण अधिकार के साथ तृप्त करता है । तो संयम सही मायनों में वासनाओं का दमन करना नहीं है वरन उसे सही मार्ग की ओर प्रवाहित करना है । धर्म के ठेकेदार बन बैठे, अपने आप को गुरु कहलाने वाले कथित बाबा खुद ही संयम और वासना को लेकर भ्रमित है और समाज को भ्रमित कर रहे है । ऐसे में एक साधारण मनुष्य से बेहतर और कौन संयम को परिभाषित कर सकता है ?

First Night फर्स्ट नाईट

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‘न  तुम शरमाई, न घबराई और न ही चीखी । अनुभवी हो क्या ?’ उसकी अनावृत देह से अलग होने के बाद थोड़ी देर सुस्ताकर उसने अपनी नई नवेली दुल्हन से हल्के अंदाज में मजाक करते हुए पूछा । ‘हां ।’ बिना किसी झिझक के सच्चाई स्वीकार करते हुए उसने जवाब दिया । ‘तुम्हारे कहने का मतलब क्या है ?’ अपनी आशा के विपरीत उसका जवाब पाकर वह चौंक कर बैठ गया । ‘तुम में भी तो मुझे वह झिझक, उतावलापन और हताशा नहीं दिखाई दी जो फर्स्ट नाईट को एक वर्जिन पुरुष में होनी चाहिए । एक शातिर खिलाड़ी की भांति तुम सब कुछ बड़े आराम से कर गए ।’ उसकी तरह ही अनुभवी उसकी पत्नी ने सच्चाई भांपते हुए उस पर आक्षेप किया । शादी से पहले किसी और के संग कई रंगीन रातें बिताने के बावजूद पत्नी के रूप में सतीत्व की प्रतिकृति पाने की उसकी चाहत रात के अन्धेरें में कहीं खो गई । फर्स्ट नाईट को अपने सेकेण्ड हेंड अनुभव के साथ वे दोनों चुपचाप करवट बदल कर सो गए ।

दायित्वबोध

शहर में अचानक ही किसी झगड़े ने बढ़कर दंगे का रूप ले लिया था । काफी प्रयासो के बाद भी स्कूल से निकले मेरे दस वर्षीय लड़के का पता न चल पाया । मैं उसे खोजने स्कूल की ओर निकला तभी पत्नी ने टोका –‘उस ओर जाते हो तो मिसेस वर्मा के बच्चों को भी लेते आना । मि . वर्मा टूर पर गए है । बेचारी मिसेस वर्मा कहां भटकेगी ?’ ‘ओफ्फो, यहां अपनी जान आफत में है और तुम्हें दूसरों की पड़ी है ।’ मैं खीज उठा । तभी एक दुबला-पतला  युवक मेरे लड़के को घर लेकर आया । अपने बच्चे को पाकर मैं खुशी  से झूम उठा और उसका शुक्रिया अदा करते हुए कहा –‘अभी यहीं रुक जाओ । स्थिति काबू में आ जाए, तब चले जाना ।’ ‘अरे नहीं । तब तक बहुत देर हो जाएगी । अभी और कितने ही मासूमों को मेरी जरूरत है ।’ उसने जवाब दिया और चल पड़ा । अपने ऊपर लज्जित मैं बिना एक पल गंवाए मिसेस वर्मा के बच्चों को लेने चल दिया ।

सामान

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पहल

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‘कुल मिलाकर ८ ही कन्या हो रही हैं । नवरात्र पूजन और भोज के लिये एक कम पड़ रही है ।’ उंगलियों पर मोहल्ले की ८ से १३ साल की कन्याओं की गिनती करते हुए रत्ना बोली ।

Feelings

‘Listen Mummy, I saw an accident today while coming back to home. A family met an accident. The man died on the spot but his wife and 6-7 years old daughter injured badly. With help of other people I took both of them in the hospital. Doctors needed blood to save   that little girl’s life. My blood group was matched so I donate to save her life. See my donor ID Card.’    A week ago, his 20 years old son has donated the blood first time and showed her his Blood donate card. Today she was crying while seeing the Donor ID Card. ‘Mummy I did good job. Didn’t I?   That little girl was in need of blood and few drops of my blood saved her life.’ She re-called the words said by her son. She was sad and now alone as well. Suddenly she stood up and remembered the address of that little girl which his son told her that day. She walked towards little girls home. While seeing the girl she hugged her and cried. She felt that she found her blood – her son again. ...

Charitra Praman Patra

चरित्र व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण अंग होता है। स्वाभिमानी व्यक्ति के लिया चरित्र से बढकर और कोई चीज नहीं होती। आजकल बैंक अकाउंट खोलवाने के लिए, नौकरी पाने के लिए, पासपोर्ट बनवाने के लिए सभी जगह तो अपने  चरित्र को प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है। इसी मुद्दे को लेकर प्रस्तुत है मेरी लघुकथा -- ''चरित्र प्रमाण पत्र'' 'सर , आपके कहे अनुसार सारे डाक्यूमेंट्स लेकर आया हूँ मै  अबकी बार। देख लीजिये।' उसने अपनी फाइल टेबल पर रखते हुए कहा। 'हाँ .. हाँ .. ठीक है। कल सुबह 10 बजे आ जाना। बड़े साहब नहीं है अभी।' बड़े साहब के असिस्टेंट ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा। 'कल 10 बजे? पर पहले तो आपने कहा था कि आज ही सारा काम हो जायेगा।' 'कहा था, तो ? अब कह रहा हूँ न कि नहीं होगा आज।' असिस्टेंट ने सहज ऊँचे स्वर में कहा। 'ठीक है सर, जैसी आपकी मर्जी। अगर आज ...