संयम
वासना भावनाओं की एक सरिता है । इसका अर्थ अधिकतर यौन सम्बन्धों से ही ले लिया जाता है जबकि इसका साधारण अर्थ इच्छा, कामना, मनोरथ, ज्ञान,संस्कार आदि है । वासना एक आंतरिक मनोवेग है और यह स्वाभाविक है । जब इन मनोवेगों पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं हो पाता तब ही यह व्यभिचार का रूप लेती है ।
शुभकामना की तरह वासना भी की कामना भी शुभ ही है । कोई प्राणी इससे अछूता नहीं । मनुष्य को तो दृढ़तापूर्वक इस प्रकार के आत्मिक संघर्षो का सामना करना पड़ता है । इसे पवित्र बनाये रखने के लिए ईश्वर ने इसे पवित्र संस्कार का रूप दिया है जिससे मनुष्य विवाह संस्कार के पवित्र बंधन में बंधकर स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इस कामवासना को पूर्ण अधिकार के साथ तृप्त करता है ।
तो संयम सही मायनों में वासनाओं का दमन करना नहीं है वरन उसे सही मार्ग की ओर प्रवाहित करना है । धर्म के ठेकेदार बन बैठे, अपने आप को गुरु कहलाने वाले कथित बाबा खुद ही संयम और वासना को लेकर भ्रमित है और समाज को भ्रमित कर रहे है । ऐसे में एक साधारण मनुष्य से बेहतर और कौन संयम को परिभाषित कर सकता है ?
शुभकामना की तरह वासना भी की कामना भी शुभ ही है । कोई प्राणी इससे अछूता नहीं । मनुष्य को तो दृढ़तापूर्वक इस प्रकार के आत्मिक संघर्षो का सामना करना पड़ता है । इसे पवित्र बनाये रखने के लिए ईश्वर ने इसे पवित्र संस्कार का रूप दिया है जिससे मनुष्य विवाह संस्कार के पवित्र बंधन में बंधकर स्वतंत्रता पूर्वक अपनी इस कामवासना को पूर्ण अधिकार के साथ तृप्त करता है ।
तो संयम सही मायनों में वासनाओं का दमन करना नहीं है वरन उसे सही मार्ग की ओर प्रवाहित करना है । धर्म के ठेकेदार बन बैठे, अपने आप को गुरु कहलाने वाले कथित बाबा खुद ही संयम और वासना को लेकर भ्रमित है और समाज को भ्रमित कर रहे है । ऐसे में एक साधारण मनुष्य से बेहतर और कौन संयम को परिभाषित कर सकता है ?

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