पहल


‘कुल मिलाकर ८ ही कन्या हो रही हैं । नवरात्र पूजन और भोज के लिये एक कम पड़ रही है ।’ उंगलियों पर मोहल्ले की ८ से १३ साल की कन्याओं की गिनती करते हुए रत्ना बोली ।


‘८ कैसे ? पंडितजी की शालू को गिना ?’ पलंग पर बैठे हुए बहू रत्ना की गतिविधियों पर गौर करते हुए सास ने पूछा ।

‘पंडितजी की शालू? सब जानते हुए भी ..... उसे तो इस बार किसी ने पूजन पर नहीं बुलाया फिर हम क्यों समाज का रोष अपने ऊपर लें ।’ रत्ना ने बेपरवाही से जवाब दिया ।

‘छोरी के साथ जो हुआ, उसमें उस मासूम का क्या दोष ? गिन ले उसे भी । पूरी नौ हो जायेंगी ।’ सास के स्वर में आदेश था ।
‘मां, सब जानते हुए भी उसे गिन लूं ? हमें अक्षत कुमारियां पूजनी हैं । फिर उसे बुलाया तो लोग क्या कहेंगे ?’

‘री बहू ! उस हैवान के किए हुए अपराध की सजा वह बच्ची क्यों पाये ? मेरी नजरों में तो वह बच्ची अपनी रीतू की तरह ही मासूम है । लोगों का क्या है – जब शिकार हुई थी तब भी बोले थे , अब भी बोल लेंगे । उस हादसे से बाहर निकलकर हमें ही उसे स्वस्थ जिन्दगी देनी है ।’

सास के समझदारी भरे वाक्यों को अमल में रखते हुए रत्ना ने अपनी गिनती पूरी कर ली ।

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