Charitra Praman Patra

चरित्र व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण अंग होता है। स्वाभिमानी व्यक्ति के लिया चरित्र से बढकर और कोई चीज नहीं होती। आजकल बैंक अकाउंट खोलवाने के लिए, नौकरी पाने के लिए, पासपोर्ट बनवाने के लिए सभी जगह तो अपने  चरित्र को प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है। इसी मुद्दे को लेकर प्रस्तुत है मेरी लघुकथा -- ''चरित्र प्रमाण पत्र''

'सर , आपके कहे अनुसार सारे डाक्यूमेंट्स लेकर आया हूँ मै  अबकी बार। देख लीजिये।' उसने अपनी फाइल टेबल पर रखते हुए कहा।

'हाँ .. हाँ .. ठीक है। कल सुबह 10 बजे आ जाना। बड़े साहब नहीं है अभी।' बड़े साहब के असिस्टेंट ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा।

'कल 10 बजे? पर पहले तो आपने कहा था कि आज ही सारा काम हो जायेगा।'

'कहा था, तो ? अब कह रहा हूँ न कि नहीं होगा आज।' असिस्टेंट ने सहज ऊँचे स्वर में कहा।

'ठीक है सर, जैसी आपकी मर्जी। अगर आज काम हो जाता तो कल मेरा नौकरी का दिन नहीं बिगड़ता। इसी से आपसे रिक्वेस्ट कर रहा था।' असिस्टेंट का मूड भांपकर वह केबिन से बाहर जाने लगा।

'अरे सुन।' असिस्टेंट ने उसे पुकारा। आँखों में काम हो जाने की आश लिए वापसी को उठे उसके कदम रुक गए।

'तेरे जैसे भले इंसान को देखकर एक सलाह दे रहा हूँ , फ्री में।'

'क्या सर ?' असिस्टेंट की बाते सुनकर उसकी आँखों में चमक आ गयी।

'यहाँ कोई भी काम चाय पानी के बिना नहीं होता। थोडा बहुत तो देना ही होता है तो ही काम फटाफट हो जाता है।' असिस्टेंट ने धीमे स्वर में कहा।

'मतलब?' उसकी आँखों में अब प्रश्न तैर रहा था।

'मतलब साफ़ है। कुछ ले देकर अपना काम करवा ले, नहीं महीनो तक धक्के ही खाता रहेगा।'

असिस्टेंट की बात का मर्म  जानकर उसने 100 रूपये की नोट उसके आगे धर दी।

'चरित्र प्रमाण पत्र लेने के लिए ये कुछ कम है।' उसकी फाइल हाथ में लेते हुए असिस्टेंट ने कहा।

'दूसरी 100 रुपये की एक और नोट उसने टेबल पर रख दी।'

एक भ्रष्ट कर्मचारी के हाथो से अपना चरित्र प्रमाण पत्र लेकर वह क्राइम ब्रांच की शाखा से बाहर निकल आया।

--- आपका ही

आशीष दलाल  

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